Shri Swami Samarth
shri swami samarth श्री स्वामी समर्थ नमस्कार दोस्तों आज हम श्री स्वामी समर्थ के बारे मे जानेंगे। जिन्हे ब्रम्हांड नायक भी कहा जाता है।
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1)जन्म स्थान और जन्म कथा
श्री स्वामी समर्थ इन्हे अक्कलकोट स्वामी के नाम से भी जाना जाता हैं। हम बहुत भाग्यशाली है जो हमे स्वामी जैसे संत को जानने का अवसर मिला हैं। वैसे तो श्री स्वामी समर्थ महाराज का जन्म कैसे हुआ ये किसीको भी मालूम नही है। लेकिन मान्यता और ग्रंथो के नुसार उनके प्रगट होने का उल्लेख है।
श्री स्वामी समर्थ महाराज ये दत्त प्रभु के तीसरे अवतार माने जाते हैं। दत्त प्रभु का दूसरा अवतार श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी है । नृसिंह स्वामीजी ने कर्दली वन मे ३०० साल कठोर तपस्या की । shri swami samarth
इस काल मे स्वामीजी के शरीर पर चिटीयोने अपना घर बना लिया । एक दिन एक उद्धव नाम का आदमी इस कर्दली वन मे लखड़ी काटने आया और लखड़ी काटते हुए उसके हाथ से कुऱ्हाडी उस वारुल पे जा गिरी , और उस वारूल से रक्त की धारा निकलने लगी लकड़हारा भयभीत हो गया तभी एक दिव्यप्रकाश हुआ और स्वामी प्रगट हुए। उन्हें ही श्री स्वामी समर्थ के नाम से जाना जाता है।
उसके बाद स्वामी समर्थ महाराज ने अनेकों तीर्थ स्थल पर पहुंचे सभी देवी देवताओं के दर्शन किए । बाद में यात्रा करते करते श्री स्वामी समर्थ संतो की भूमि महाराष्ट्र में स्तिथ सोलापुर जिले में अक्कलकोट गांव मे पहुंचे। अक्कलकोट में खंडोबा मंदिर में श्री स्वामी समर्थ रुके, वैसे तो स्वामी जी का कोई ठिकाना नहीं है वे समस्त संसार में उनका ठिकाना है ।
२)अवतार
श्री स्वामी समर्थ को दत्तात्रय भगवान का तीसरा अवतार माना जाता है । माता अनुसया के पुत्र भगवान दत्तात्रय याने ब्रह्मा विष्णु महेश के अवतार है। उनका ही दूसरा अवतार
श्रीपाद वल्लभ है। श्रीपाद श्रीवल्लभ इनका जन्म पीठापुर में हुआ। और इनके बाद उनका दूसरा अवतार श्रीनृसिह सरस्वती जिनका जन्म कारंजानगर हुआ। इन्होंने हीshri swami samarthश्रीवल्लभ जी की पादुका गाणगापुर स्थापन की है। बाद में वे कर्दली वन मे गुप्त हो गए। ३०० सालो बाद श्री स्वामी समर्थ के रूप में प्रगट हुए।
ये सभी दत्त प्रभु के अवतार हैं , दत्त प्रभु ने अपने भक्तो के लिए और जग के कल्याण हेतु ये सभी अवतार लेकर सभी को मार्गदर्शन किया है। अपने भक्तो के दुःख समाप्त किए।
श्री स्वामी समर्थ को गजानन महाराज का भी गुरु माना जाता है। संत गजानन महाराज जो की शेगांव के में रहकर उन्होंने अपने भक्तों का कल्याण किया। साथ में ही शिर्डी के साई बाबा भी श्री स्वामी समर्थ महाराज को अपना गुरु मानते थे ऐसा बताया जाता है। साथ में ही शंकर महाराज भी श्री स्वामी समर्थ महाराज को अपना गुरु मानते है ऐसी मान्यता है। इन सभी संतो ने अपने कार्यकाल में भक्तों का उद्धार किया है। ऐसे संतो को कोटि कोटि प्रणाम जिन्होंने अपने भक्तों का मार्गदर्शन कर उन्हे सही रास्ता दिखाया।
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३)श्री स्वामी समर्थ महाराज के चमत्कार
श्री स्वामी समर्थ महाराज जब अक्कलकोट आए तो वे पेड़ के नीचे बैठे थे तभी कुछ लोग वहां पर चिलम पी रही थे तभी उन्होंने सोचा की महाराज के साथ मजाक करते हैं और उन्होंने स्वामी समर्थ महाराज को पूछा कि महाराज आप चिलम पिएंगे । महाराज ने हां बोला उसपर उन लोगों ने महाराज को खाली चिलिम दी और बोले ये लीजिए महाराज और सभी हसने लगे तभी महाराज ने चिलम ली और पीने लगे और सच मे चिलम से धुआं निकलने लगा।
ये देख सभी लोग हैरान होने लगे और श्री स्वामी समर्थ महाराज के चरण पकड़कर माफी मांगने लगे। श्री स्वामी समर्थ महाराज ने सभी को माफ कर 'shri swami samarth' दिया और कहा कि कभी किसी महाराज या संतों के साथ मजाक मत करना।
तभी वहा के लोगो ने सोचा महाराज भूखे होंगे इनके लिए खाना लाना होगा तभी वहा से चोल्लपा नामक एक गृहस्थ वहा से जा रहे थे जो की आगे जाकर स्वामी समर्थ महाराज के शिष्य बने। चोल्लपा महाराज वैसे भी बड़े भक्ति भाव से गांव में आने वाले सभी साधु संतो को खाना खिलाते थे। तभी उन्होंने महाराज को अपने घर चलने का आग्रह किया और भोजन के लिए अपने घर लेकर गए । घर जाते ही उन्होंने अपनी पत्नी से बोला पानी लेकर आओ मुझे महाराज के चरण धोने है उसपर उनके पत्नी ने पाणी देने से मना कर दिया और कहा की पानी लाने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है। उसपर महाराज ने कहा कि घरपर इतना बड़ा कुआ होते हुए भी तुम पाणी लाने के लिए बाहर क्यों जाति हो। चोलपा महाराज के घर का कुआ सुखा पड़ा था । तभी महाराज उस कुएं के पास गए और अपना चमत्कार दिखाया। सालो से सूखे पड़े कुएं में पाणी आया था इस चमत्कार को देखकर सभी हैरान हो गए। ये कुआ आज भी अक्कलकोट में मौजूद है।
श्री स्वामी समर्थ महाराज जी ने अपने कार्यकाल में अनेकों चमत्कार किए हैं। भक्तों के कल्याण के श्री स्वामी समर्थ महाराज ने अनेकों कार्य किए हैं। श्री स्वामी समर्थ महाराज अभी यहां पर दिखाई देते थे तो shri swami samarth कभी और जगह पर दिखाई देते थे।श्री स्वामि समर्थ अपने भक्तो को बहुत ही प्यार करते है इसका अनुभव बहुत ही भक्तो को चमत्कार के रूप में दिखाई देता है।स्वामि जी ने भक्तो के कल्याण के लिए बहुत सारे चमत्कार किए हैं।
एक गृहस्थ जिनका का नाम बसप्पा था वो श्री स्वामी समर्थ महाराज के भक्त थे। महाराज की सेवा करने के लिए वो महाराज के साथ रहते थे। उनकी पत्नी मजदूरी करके अपने बच्चों और अपना गुजारा करती थी। एक दिन श्री स्वामी समर्थ महाराज जंगल में जाने लगे बसप्पा भी उनके पिछे जाने लगे उसपर महाराज ने कहा बसप्पा क्यो मेरे पिछे पिछे आते हो घर जाओ तुम्हारे बच्चे और बीबी राह देख रहे है। उसपर बसप्पा में आपको छोड़कर नहीं जाऊंगा, में आपके साथ ही रहूंगा। ये सुनकर स्वामी आगे चलने लगे आगे चलने के बाद बसप्पा के सामने बहुत सारे साप आ गए। बसप्पा घबरा गया और स्वामी जी से कहा यहापर साप है। श्री स्वामी समर्थ महाराज उसपर बोले तुम्हे जीतने चाहिए उतने ले लो, बसप्पा घबराते हुए साप को लेने लगा और स्वामीजी के आदेश से घर पर गया। घर जाते ही उसने घर के लोगो से कहा मुझे महाराज जी ने साप दिया है। उस पोटली को खोलकर देखा तो वो साप सोने का हो गया था। यह चमत्कार देख कर सभी श्री स्वामी समर्थ महाराज का धन्यवाद करने लगे।
महाराज ने ऐसे अनेकों चमत्कार अपने कार्यकाल में किए हैं। बहोत सारे भक्तों का दरिद्र दूर किया बहुत सारे लोगो को अनेक बीमारी से मुक्त किया है।
४)श्री स्वामी समर्थ महाराज के मंत्र
श्री स्वामी समर्थ जी का मराठी में एक प्रसिद्ध वाक्य है
" भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे" इस वाक्य को सुनते ही मन को बड़ी प्रसन्नता मिलती है । मानो तो लगता की सच मे स्वामि हमारे साथ है। सभी संकटों में काम आने वाले स्वामीजी के ये मूल्यवान बोल है। जो हमे उनके होने का अहसास दिलाते है। "shri swami samarth"
स्वामि जी के मंत्र जप से ही हमे एक पॉजिटिव एनर्जी का अहसास होता है। इनका प्रमुख मंत्र उनके नाम से ही शुरू होता है श्री स्वामी समर्थ ये इस मंत्र का जाप आप कर सकते है, इनका तारक मंत्र भी बहुत शक्तिशाली मंत्र है।
असंभव को संभव बनाया है। अपने भक्तो का कल्याण किया है ।
श्री स्वामी समर्थ महाराज का तारक मंत्र
निशंक होई रे मना
निर्भय होई रे मना
प्रचंड स्वामी बळ पाठीशी नित्य आहे रे मना
अतर्क्य अवधूत हे स्मरण गामी
अशक्य हि शक्य करतील स्वामी
उगाशी भितोसी भय हे पळू दे
जवळी उभी स्वामी शक्ती कळू दे
असे जन्म मृत्यू जरी खेळ त्याचा
नको घाबरु तू असे बाळ त्याचा
अशक्य हि शक्य करतील स्वामी
खरा होई जागा श्रध्देसहित
कसा होशील त्याविन तू स्वामी भक्त
आठव कितीदा दिली त्यानेच साथ
नको डगमगू स्वामी देतील हात
अशक्य हि शक्य करतील स्वामी
विभूती नमन नाम ध्यानादी तीर्थ
स्वामीच या पंचामृतात
हे तीर्थ घेई आठवी रे प्रचिती
न सोडती तया जया स्वामी घेती हाती
अशक्य हि शक्य करतील स्वामी
इस प्रकार ये मंत्र है
५) मंदिर और समाधि स्थल
श्री स्वामी समर्थ महाराज का मंदिर अक्कलकोट मे है । जो की अपने आप में बहुत ही सुंदर मंदिर है। जहां पर करोड़ों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। अक्कल कोट में भक्तो के लिए बहुत सारी व्यवस्था की गई है। यहां पर गाड़ी पार्किंग की भी व्यवस्था है।
यहां पर एक बहुत ही पुराना गणेश मंदिर है। कहते है की इस मंदिर मे सभी की मनोकामना पूरी होती है। मंदिर के परिसर में आपको छत्रपति शिवाजी महाराज की बहुत ही सुंदर मूर्ति बनाई है। मंदिर के परिसर मे बहुत सुंदर गार्डन बनाया है जिसे देख कर आपका मन प्रसन्न हो जायेगा। मंदिर के बाहर आपको फूल और प्रसाद की दुकानें है।
मंदिर में जाते ही आपको वटवृक्ष मंदिर दिखाई देगा जहा पर श्री स्वामी समर्थ महाराज बैठते थे। यहां पर अनेकों भक्त दर्शन के लिए आते है।shri swami samarth
उसके बाद आप श्री बाळप्पा महाराज के मठ में जा सकते हैं इसे ही गुरू मंदिर भी कहा जाता है । ये मंदिर वट वृक्ष मंदिर के पास मे ही थोड़ी दूर अंतर पर है। इस मंदिर में प्रत्यक्ष श्री स्वामी समर्थ महाराज के चरण आपको मंदिर फर्श पर दिखाई देते है। जो की एक अदभुत चमत्कार है।
उस सभी फर्श को चौकट बना के रखी है ताकि किसिका पैर उस पर ना पड़े। मठ के अंदर श्री गणेश जी मूर्ति विराजित है। इसी मठ में आपको श्री स्वामी समर्थ महाराज जी के श्री महालक्ष्मी के रूप में भी दर्शन होंगे । मुंबई के एक स्वामी भक्त थे जिन्हे कुछ कारणों के कारण कोल्हापुर में श्री महालक्ष्मी जाने को नही मिल रहा था। तब उन्हे श्री स्वामी समर्थ महाराज ने स्वप्न में लक्ष्मी रूप में दर्शन दिए थे। इसी मठ के पीछे भक्तो के भोजन के लिए अन्न छत्रालय है । यहां पर भोजन की उत्तम व्यवस्था की गई है। यही पर श्री राम जी का सुंदर मंदिर है। बाजू में गौशाला भी है।
समाधी मठ याने चोळप्पा महाराज का घर यहां पर श्री स्वामी समर्थ महाराज के समाधी का दर्शन आपको होगा ।
चोळप्पा महाराज के घर को ही अभी मंदिर बना दिया गया है। जो की आज चोळप्पा महाराज का मठ के नाम से जाना जाता है। ये मठ काफी सुंदर है इसे देखने के बाद आपको प्रसन्नता मिलेगी। यह पर आप अभिषेक भी कर सकते हैं।
इसी मंदिर के बाजू में श्री स्वामी समर्थ महाराज का शेजघर भी है। यहां स्वामी जी की कुछ वस्तु ये रखी है।
यही पर वो कुआ मौजूद है जिसे श्री स्वामी समर्थ महाराज ने सूखे हुए कुएं में पाणी लाया था। आज कितना भी दुस्काल आ जाए इस कुएं का पाणी कभी कम नहीं होता।
६)कार्यकाल 1956-1978
श्री स्वामी समर्थ महाराज का कार्यकाल २२ वर्ष का बताया जाता है । इस समय में अक्कल कोट राजे मालोजी राजे भोसले थे। इन दिनों मे स्वामी समर्थ महाराज ने अनेकों भक्तों का उद्धार किया है, उन्हे मार्गदर्शन किया है ।
७) श्री स्वामी समर्थ महाराज के सेवेकरी
श्री स्वामी समर्थ महाराज के सेवेकरी सभी गांव वासी थे लेकिन उसने में से कुछ लोग बहुत ही मनोभाव से स्वामी जी की सेवा करते थे।
श्री स्वामी समर्थ महाराज के सेवेकरि में प्रमुख नाम आता है
चोळप्पा महाराज का जिन्होंने बड़े ही भक्ति भाव से स्वामी जी की सेवा की।चोळप्पा पर श्री स्वामी समर्थ महाराज की विषेश कृपा थी।
श्री स्वामी समर्थshri swami samarth महाराज के सेवेकरी में दूसरा नाम आता है श्री बाळप्पा महाराज का जिन्होंने श्री स्वामी समर्थ महाराज की सेवा की। बाळप्पा महाराज घर का त्याग कर चुके थे और भक्तिभाव से श्री स्वामी समर्थ महाराज की सेवा करते थे। बाळप्पा महाराज एक व्यावसायिक थे बाद में उनका मन संसार नही लगने लगा तभी वो गाणगापुर में आए। और मंदिर के पास बैठे रहते थे। तभी अचानक एक दिन उनके सप्न में एक स्वामी दिखाई दिए और बोले अक्कलकोट आओ में अक्कलकोट मे हु। तभी बाळप्पा महाराज अक्कलकोट आए। अक्कलकोट मे आते ही श्री स्वामी समर्थ महाराज को देखकर बाळप्पा महाराज आचर्यचकीत हो गए जिस स्वामी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए थे वो श्री स्वामी समर्थ महाराज ही थे।बाळप्पा महाराज को देखकर स्वामीजी खुश हो गए। तभी से बाळप्पा महाराज श्री स्वामी समर्थ महाराज की सेवा करने लगे।
श्री स्वामी समर्थ महाराज की सेवा में एक महिला भी थी जिनका नाम था सुंदरा बाई। सुंदरा बाई महाराज की बड़ी अच्छी सेवा करती थी उनके लिए खाना लाना भक्तो की व्यवस्था करना आदि सारे काम सुंदरा बाई करती थी।
सुंदरा बाई जब अक्कल कोट मे आई थी तब उनके पैर में दर्द था। वो स्वामीजी की कृपा के कारण ठीक हुआ। बाद मे बाई को इस दुनिया में कोई भी न होने कारण चोलप्पा महाराज ने उन्हें श्री स्वामी समर्थ महाराज की सेवा में रख लिया। आगे चलकर सुंदरा बाई अनेकों काम संभालती थी।shri swami samarth
लेकिन कुछ दिनो बाद सुंदरा बाई भक्तों से श्री स्वामी समर्थ महाराज के दर्शन के लिए पैसे लेने लगी । यह सब स्वामी देख रहे थे। सही समय आने पर महाराज ने सुंदरा बाई को सबक सिखाया एक दिन राजा के शिपाई आकर सुंदरा बाईको लेकर गए।
श्री स्वामी समर्थ महाराज के सेवा में चोलप्पा महाराज के जमाई भी थे। साथ में ही श्री स्वामी समर्थ महाराज के सेवा में राजा की ओर से एक सीपाई भी था।
अक्कलकोट चके राजे मालोजी राजे भोसले थे। राजे ने भी महाराज की बड़ी सेवा की कुछ दिन महाराज रानी के आग्रह के कारण राजवाड़े में भी रहे लेकिन स्वामी को ये पसंद नही आया क्योंकि सामान्य भक्त श्री स्वामी समर्थ महाराज राजवाड़े में होने के कारण दर्शन नहीं कर पाते थे।
श्री स्वामी समर्थ महाराज का आखरी वाक्य
शिव हर शंकर
नमामी शंकर
शंभो शिव शंकर
हे गिरजा पते
भवानी शंकर
शिव शंकर शंभो
हम गया नही जिंदा है ।
भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे
श्री स्वामी समर्थ
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